आशुतोष द्विवेदी
विद्यार्थी जीवन में हिंदी साहित्य से लगाव था, सो अज्ञेय कृत नदी के द्वीप और शेखर एक जीवनी पढ़ गया था। बाद में मालूम हुआ कि शेखर सिविल सर्विसेस के पाठ्यक्रम में भी है, तो दुबारा पढ़ा।तब अज्ञेय का यह कोटेशन मान गया था, “जान” नहीं पाया था।
जानने की प्रक्रिया कुछ ही वर्षों पहले शुरू हो पाई, जब आध्यात्मिकता से कुछ सम्पर्क होने लगा। तब यह समझ आने लगा कि ‘डर’ का मुख्य कारण ‘खो’ देने की आशंका है। जो भी हमारे पास है- जीवन, धन, पद, स्वास्थ्य, व्यक्ति, सम्बन्ध आदि- वह खो न जाये, यही डर है।
और गहरे में जाएं तो, वर्तमान में न जीकर, अनागत ( भविष्य) की आशंका ही ‘भय’ का मुख्य कारण है। जब हम स्वीकार करना सीख जाते हैं तो भय कम होता चला जाता है।
हर परिस्थिति को स्वीकार करना, क्योंकि हमारा नियंत्रण बाहरी ताकतों पर नहीं, उससे होने वाली हमारी प्रतिक्रिया मात्र पर ही है।
अपने ‘मन’ के खेल जैसे जैसे समझ आने लगते हैं, वैसे वैसे जीवन आसान होने लगता है।
ईश्वर इस ‘संचारी’ भाव को ‘स्थायी’ भाव बनाये रखने की दृष्टि/शक्ति प्रदान करें।
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